Saturday, January 9, 2016

गद्दारी और खुद्दारी
घर में ही गद्दार बहुत हैं घर में आग लगाने को
राजनीति तैयार खडी है आतंकी पनपाने को
किस-किस की पहचान करोगे डेढ अरब की भीडों में
कितने अण्डे छिपे पडे हैं इन डेढ अरब के नीडों में
हर अण्डो में तैयार संपोले छिपे पडे हैं खाने को
घर में ही गद्दार बहुत है घर मे आग लगाने को

ये बोट बैंक की राजनीति आतंकवाद पनपाती हेै
कौम,कबीले, मजहब, जाति ही तो घर को खाती है
हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई सब डबरे बन जाते हैं
आतंकवाद को ये कीचड के डबरे ही पनपाते हैं
तैयार खडे है सभी दरिन्दे पोखर में खिलजाने को
घर में ही गद्दार बहुत है घर में आग लगाने को

बोट बेैंक की लग्न , लालसा इन्हे सुरक्षा देती है
इस प्रजातन्त्र में राजनीति की हरी - भरी ये खेती है
अगल-बगल का कूडा करकट नेता ही तो पाल रहे हैं
सभी सियासी अपने-अपने ढंग से दहशत डाल रहे हैं
छुट भैय्या तैयार खडे हैं राष्ट्र - गीत को गाने को
घर में ही गद्दार बहुत है घर में आग लगाने को

कंही राष्ट्रगीत के झगडे है,कंही धर्म,मजहब के रगडे हैं
आरक्षण कंही जाति हैं कंही कौम के अगडे पिछडे है
कही नारी शक्ति अभिव्यक्ति ,कंही अहंकार आसक्ति है
कंही सम्प्रदाय की तख्ती है,कंही भोगी-भोग विरक्ति है
धर्म शिखर पर खडा हुआ है, आत्मघात करवाने को
घर मे ही गद्दार बहुत है घर में आग लगाने को

कोई मन्दिर, मस्जिद ढोता है,कोई भूखा,नगा रोता है
कोई अहंकार को बोता है, कोई आग लगाकर सोता है
अल्लाह,ईश्वर की पहचाने मन्दिर,मस्जिद से होती हैं
इस खूनी, कतली झगडे में केवल पूजा ही रोती है
धर्म - गुरू तैयार खडे हैं मजहब को भडकाने को
घर में ही गद्दार बहुत है घर में आग लगाने को

आजद करो भगवानो को इन घुटती चार दीवारों से
राम ,कृष्ण को मुक्त करो, सीमेन्ट ,ईंट के गारों से
अल्लाह को खुल्ला छोडो,जो विसमिल्लाह तो बोल सके
इस धर्म,मजहब की धरती में औकात हमारी तोल सके
तैयार खडा है कवि आग भी दिल में अलख जगाने को
घर में ही गद्दार बहुत है घर में आग लगाने को।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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