धर्म का मर्म
अल्लाह ,ईश्वर , ईशा, मूसा मजहब कंहा बनाते है
ब्रह्मा ,विष्णु, शिव, लम्बोदर दुनियां में कब आते हैं
राम,कृष्ण,महावीर,बुद्व ने केवल अपनी बात कही है
राधास्वामी,निरंकार,सिक्ख सम्प्रदाय भी सभी सही है
दुर्गा, लक्ष्मी, और शारदा चौराहों पर भटक रही है
सुन्दर नारी काम वाशना की नजरों में खटक रही है
ज्ञानी,ध्यानी इन्द्र देव सब कामुक हो कर घूम रहे है
उर्वशी, मेनका, रम्भाओं की छााती में सब झूम रहे है
वेद,पुराण,गीता ,रामायण दुनियां भर में बांच रहे हैं
प्रवक्ता तोतो को सुनकर, अन्ध भक्त सब नाच रहे हैं
इस कलियुग में धर्म का धन्धा केवल बापू पनपाते हैं
धर्म के पण्डित व्यवसायी सब ,धर्मो से रोटी खाते है
चौराहों पर धर्म - कर्म के वक्ताओं की हाट लगी है
प्रेम अहिंसा गौण हो गयी ,बस पापों की बाट लगी है
परम्परा पर चलने वाले, ज्यादा हिंसा फैलाते हैं
डाकू, चोर, लुटेरे भी अब गीत धर्म के ही गाते हैं
आतंकवाद भी धर्म-कर्म की इस रूढी में बसा हुआ है
विपरीत धर्म का देख शिकंजा,आपस में ही कसा हुआ है
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख ,इसाई, प्रतिद्वन्द्वी को काट रहे हैं
धर्म-गुरू सब मिलकर मानव को डबरो में बाट रहे हैं
धर्म ,धरा से निपट गया है, अब केवल बातें होती हैं
ज्ञान-ध्यान की इस धरती में क्यों केवल घाते होती हैं
हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई, कौम कबीले दूर करो
एक जाति हो मानवता बस, मानवता भरपूर भरो
ईश्वर,अल्लाह सभी एक है पञ्चतत्व का भेद नही है
अन्ध-भक्त के अपशब्दो का मुझको कोई खेद नही है
अब कोई ऐसा धर्म बने , बस मानवता निर्माण करो
कवि आग कहता है, धरती मां का कुछ कल्याण करो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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