दुष्ट और कुष्ट
जन्नत को खंगाल रहे हो निर्दोषों की लाशों में
कैसा मजहब बनाया है जो डूबा, भोग - विलाशों में
क्या अल्लाह भी छिपा पडा है इन चौपड के पासों में
मरती है नादान कौम इन धर्म, मजहब के झांसो मे
कंहा गयी वो पीर - फकीरी, जिसका राग सुनाते हो
कंहा गये वो सभी फरिस्ते, जिनकी आयत गाते हो
कंहा गयी नूरानी शक्ले, जिनसे ईद मनाते हो
कंहा लिखी है वो पुस्तक, जिसमे जेहादी बातें हो
हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई आड धर्म की लेते हैं
मजहब की सूखी सरिता में, नौका सब अपनी खेते हैं
बदनाम हुये है अल्लाह ,ईश्वर ,इन मुर्दो की लाशों में
आतंकी विस्फोट धधकता है क्यों आज सियासो में
दुनियां में कोई जगह बची हैे अमन चैन जंहा जिन्दा हो
कोई ऐसा मजहब बताओ जंहा आतंक चुनिन्दा हो
क्या कोई ऐसा धर्म गुरू है, जो निर्पेक्ष परिन्दा हो
हर धर्म,मजहब भी कहता हैे आतंकवाद की निन्दा हो
फिर भी कुछ मुर्दे पनप रहे हैं धर्म मजहब की आडो में
कुछ सेंघ लगाकर बैठे है गीता, कूरान की बाडों में
अपनी ही कौम को खाते हैं,कौेमो के हितैसी बन करके
ये दकियानूसी मुर्दे भी आते हैं मजहब से छन करके
धर्म अगर कंही जिन्दा हो, तो धर्मो से इनको दूर करो
औलाद बचानी है अपनी, दुष्टों को चकना चूर करो
कौम ,कबीले , मजहब हों, बस, मानवता ही शेष बचे
कवि आग के छन्दो में बस , धर्मो से ये देश बचे।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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