जवानी का जज्बा
आग की लपटो को कपटो से बुझा ना पाओगे
जलनिधि का वेग, दरिया से जुझा ना पाओगे
भाष्कर की पुञ्ज को कब तक दिया दिखलाओगे
इस धरा के अंकुरो को , और कितना खाओगे
भटके हुये को राह की मंजिल नजर आती नही
पुष्प की दुर्गन्ध देवों को कभी भाती नही
अंतर- जगत का हो समर्पण, मान से सम्मान से
वो शख्स भी डरता नही है न्याय में भगवान से
जाग कर देखो जवानी अब धरा में बह रही है
आतंक गंगा झेलती है मौन हो कर सह रही है
स्वालम्ब का अवलम्ब बनी ये जवानी कह रही है
खौंप से जर्जर सियासत की इमारत ढह रही है
इन बाजुवों के जोर से फिरका - परस्ती पाट दो
सल्तनत के रहनुमाओं की फिंजा को काट दो
कुछ कर दिखाने का हुनर हो हर जवां के हाथ में
गिड़ - गिडाकर राजनीति , हो खडी औकात में
क्यो पालते हो अनपढो को , डाकुओ को देश में
क्यो हो रही है ये सियासत मजहवी दरवेष में
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख ईसाइ मे जवानी मर रही है
जिन्दगी मे भी जहर, मुर्दा सियासत भर रही है
तेरे हाथ मे वो बात हेै, जो राम के थी हाथ में
हर शख्सियत अर्जुन बने, घनश्याम भी है साथ में
जज्बा जवानी देखिये उस बुद्ध की महावीर की
जंगलो से भी सियासत बन गयी जागीर की
क्यो मौन है यौवन यंहा उजडे़ चमन को देखकर
क्यो लाश बनकर जी रहा है,इस दमन को देखकर
क्यो शक्तियों के सामने , मुर्दे वतन को लूटते हैं
सुन्दर सुमन भी मजहबी तालीम से क्यो टूटते हैं
सूभाष, शेखर औ भगत में खौप था ,इमान था
हर युवा उस वक्त का ना इस तरह बे-जान था
शूलीयाॅ भी , हार बनती है , जवानी, जोश हो
ये--समय की माॅग है बस, हर युवा में बोष हो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो09897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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