Wednesday, January 13, 2016


त्यौहार में सियासत
ये खिचडी संक्रान्त,निमन्त्रण है खिचडी सरकारों की
भभक रही है आग लोहडी में, सत्ता गलियारो की
भुखमरी,गरीबी बनी अंगीठी, शीत लहर सरदारों की
बांंट रहे हैं, सभी रेवडी, नारों में मक्कारों की

चौराहों में बैनर, पोस्टर, सभी बधायी ,खायी में
ये नंगे, भूखे नेता घूमें कोट, पेन्ट और टाई में
राजनीति के दुश्मन आपस में आलिंगन करते हैं
वाह रे, खिचडी, तेरे कारण, कितने टुच्चे तरते हैं

अच्छा होता, प्रजातन्त्र की सोच प्रजा में आ जाती
आज भेडियों की नश्लें, जनमत की खिचडी ना खाती
लोहडी,खिचडी में तपकर,कुछ चिंतन,मंथन भी होता
प्रजातन्त्र का मालिक,सडको पर लावारिस ना रोता

त्योहार मनाये जाते हैं, सम्पन्न, समर संसारों में
नेता खिचडी, ढूंढ रहे हैं, भुख नंगे गलियारों मे
कई करोड़ के खर्चे हैं, चुनाव, चरण परचारों में
शाम को दारू, अय्यासी, होती है मिलकर यारों में

त्यौहार बने थे संप्रदाय सब मिलकर खुशी मनायेंगे
ये राजनीति के नरभक्षी, ना कौम, कबीले खायेंगे
त्यौहार,तालाबों के डबरे, घुट-घुट के मनाये जाते है
ये हिन्दू है,ये मुस्लिम है, कौमो से गिनाये जाते है

प्रारम्भ चैत्र से संवत्सर, इस आर्यखण्ड में होता है
अंग्रेजों की जनवरीयाें को ये भारत कब से ढोता है
सब मौसम,ऋतुवें जीवन की उत्कृष्ट गवाही देती हैं
ये वर्ष,हर्ष,संघर्ष सदा से, इस आर्यखण्ड की खेती है

त्यौहार में बोटों की गिनती,नेता की आंख से होती है
सम्प्रभुता मेरे भारत की, क्यों उत्सव में भी रोती है
त्यौहार हमें भी भाता है,आडम्बर से कुछ हटकर हो
कवि‘आग’के छन्द पढो,बस,भाव हृदय में डटकर हो!!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो09897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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