Tuesday, August 18, 2015

                   खाकी की झांकी
मैं खाकी  हूँ  संविधान  के   दंश दशक से झेल रही हूँ
राजनीति  से  दीन-हीन  हूँ  लावारिस  हूँ  खेल रही हूँ
खादी कफन  लिबासों  में  बीहड  के दस्यु पाल रही हूँ
लोकतन्त्र  में  दबी हुयी,अपनी इज्जत खंगाल रही हूँ

शर्दी, गर्मी,  बर्षातो  के  सभी  महातम  मैं  सहती हूँ
राजनीति  की  गन्दी  नाली  में नेता के संग बहती हूँ
चोर, उचक्के ,खूनी,  कतली   नेता   से  रिस्तेदारी है
वतन  लूटने  वाले  अधिनायक  के  घर  चौकीदारी है

व्यभिचारी, भ्रष्टाचारी  की  आज  सुरक्षा  मैं  करती हूँ
संगत से बदनाम हुयी हूँ, लोक-लाज  से  मैं मरती हूँ
राजनीति के हर मुजरिम की  बदनामी  को मै ढोती हूँ
इज्जत में सर्वस्व लुटाकर भी अपनी इज्जत खोती हूँ

होली और दीवाली, रक्षाबन्धन  कब  की  भूल चुकी हूँ
मैं समाज के सुख के कारण,खुद शूली में झूल चुकी हूँ
परिवारो का मोह  त्याग  कर, सेवा  में आसक्त पडी हू
मैं समाज के आभूषण सी  बंधी  हुयी हूँ, मौन खडी हूँ

मौतों के  इस  काल-चक्र  की मुठभेडों में मर जाती हूँ
राष्ट्र भक्ति के गुमनामो  में,राष्ट्रगीत  फिर  भी गाती हूँ
बूढे मां,बापो  का  साया  मेरी  मौत  से छिन जाता है
मेरी  विधवा  पत्नि,बच्चों  को  समाज  भी ठुकराता है

मुझे पहन  कर  इने-गिने  दो  चार  भटकते  राहों पर
ये  समाज  का  दर्पण  है  जो  जीता  सदा गुनाहों पर
राजनीति  के  अंकुश  की  ये  दबिस  हटाकर के देखो
नेताओं  की  अय्यासी  की  हवस   हटाकर   के देखो

मैं  राष्ट्र -भक्ति  के  जज्बे  को   चोैराहो  में  लहराउंगी
राष्ट्र - गीत  मैं  अपनी  कर्कस  भांषा  में   ही  गाउंगी
मैं  समाज  से  चाहती  हूँ  बस, वर्दी ना बदनाम करो
पुलिस  पर्व  में, विरह,वेदना हर समाज में आम करो ।।
                राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                       9897399815
          rajendrakikalam.blogspot.com

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