Monday, August 17, 2015

                  आग का अनुराग
मैं कविता  देश  के  अपशिष्ठ  पर  लिखता नही हूँ
मैं सियासी सोच के अफसोस  पर  बिकता नही हूँ
मैं शब्द की संवेदना  में  भी  कभी दिखता नही हूँ
आलोचनाओं से संभलता हूँ, मगर टिकता नही हूँ

मेरे  हृदय  की   वेदना   को   प्रेरणा  ही  तोडती है
शब्द  की  सरिता  सरलता से  समागम जोडती हेै
मस्तिष्क के व्यायाम को भी लेखनी ही मोडती है
फिर सुगम स्वर बीथीका में सरस्वति ही दौडती है

मै तो बस जगने,जगाने की  कला  को  जानता हूँ
जागे  हुये  को राष्ट्र का सच्चा   सिपाही  मानता हूँ
यूं तो  आँखे  खोल   कुछ   मुर्दे   खडे   चौराहों में
हाथ  मे  खादी  कफन   है  हर  सियासी  बाहों में

जिन्न,भूतों की नसल  को  छन्द से मैं नोचता हूँ
हर प्रेत में  भी  प्राण  के संचार  को  मैं पोंचता हूँ
कोई तो जागे  वतन में,बस कविता  लिख रहा हूँ
राष्ट्र की इस हाट में,मैं मुफ्त   में  ही  बिक रहा हूँ

मेरा  भरोशा   है  जवानी   की  भटकती   धार में
तूफान  में  भी   देखता  हूँ, उस  पडी  पतवार में
जो लहर सागर सूनामी मोड कर  पथ  खोलता है
तूफान को भी जो चिरागों की लपट  से तोलता है

सूभाष हो,शेखर,भगत हो, फड - फडाती  जान हो
कौम से मतलब नही,बस,पहचान हिन्दुस्तान हो
इसिलिये मेैं  राष्ट्र हित में हर कविता लिख रहा हूँ
सामर्थता की आग  हूँ, असमर्थता  से बिक रहा हूँ।।
            राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                     9897399815
      rajendrakikalam.blogspot.com

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