आशा ,राधे-आधे आधे
कृष्ण भेष में आशा बापू,घर-घर मुरली बजा चुके हैं
नारायण भी तुझसे ज्यादा,रास जमी पर रचा चुके हैं
तूने छप्पन भोग पचाये, तुझसे ज्यादा पचा चुके हैें
तुझसे ज्यादा,तुझसे सुन्दर,ये गोपी भी नचा चुके हैं
तू भी जेल में जन्मा,ये भी कारावास को भोग रहे हेैं
तेरी तो लीला थी केवल, इनके तो उद्याेग रहे हैं
तूने माखन,मिश्री खायी, स्वर्णभस्म ये चाट रहे हैं
तेरी गोपी प्रेम की प्यासी, ये अय्यासी बाँट रहे हेैं
तूने काली नाग नथा था, ये राष्ट्र को नथा रहे हैं
तेरे संग राधा नाची थी, ये नारी को सता रहे हैं
तू तो केवल बृन्दाबन की गली-गली में घूम रहा था
आशूमल और नारायण तो हर नारी को चूम रहा था
तेरे साथी श्रीदामा और उध्दव जैसे गवाल-बाल थे
आशूमल के सारे साथी, कालेधन के सभी दलाल थे
तूने अपनी सारी लीला,बालक पन में ही खेली थी
आशूमल और नारायण की सभी बूढापे में चेली थी
तेरी चर्चा बृन्दाबन थी, इनकी चर्चा जग जाहिर हेै
तूने केवल रास रची थी, विषय-भोग के ये माहिर है
तेरी महिमा ब्रह्मा,विष्णु शंकर भी खुल कर गाते हैं
आशूमल तो परब्रह्म है,खुद ही सब कुछ बन जाते है
तेरी राधा गाँव की ग्वालन,केवल मुरली ही सुनती है
दो बच्चों की राधे माता, देखो दाँव - पेंच बुनती है
तेरी राधा मथुरा, बृन्दाबन की गलियां घूम रही है
ये बम्बई की राधेमाता जिसको देखो चूम रही है
तेरी राधे माँ की चर्चा पूरी धरती पर जारी है
ये कैसी राधे माता है , दुर्गा माता पर भारी है
एक हाथ में फूल पडा है, एक हाथ त्रिशूल पडा है
वालीवुड की राधे माँ पर, कैसा अफलातून चढा है
भारत में तो सबसे सस्ता भगवानो का भेष हो गया
बाबा, माई, और गृहस्थी, आडम्बर प्रवेष हो गया
व्यभिचार के अय्यासी के धर्म-कर्म कब तक ढोओगे
कवि आग ये प्रारम्भ है ,मौन रहोगे तो राेओगे।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
मो098973998
rajendrakikalam.blogspot.com
कृष्ण भेष में आशा बापू,घर-घर मुरली बजा चुके हैं
नारायण भी तुझसे ज्यादा,रास जमी पर रचा चुके हैं
तूने छप्पन भोग पचाये, तुझसे ज्यादा पचा चुके हैें
तुझसे ज्यादा,तुझसे सुन्दर,ये गोपी भी नचा चुके हैं
तू भी जेल में जन्मा,ये भी कारावास को भोग रहे हेैं
तेरी तो लीला थी केवल, इनके तो उद्याेग रहे हैं
तूने माखन,मिश्री खायी, स्वर्णभस्म ये चाट रहे हैं
तेरी गोपी प्रेम की प्यासी, ये अय्यासी बाँट रहे हेैं
तूने काली नाग नथा था, ये राष्ट्र को नथा रहे हैं
तेरे संग राधा नाची थी, ये नारी को सता रहे हैं
तू तो केवल बृन्दाबन की गली-गली में घूम रहा था
आशूमल और नारायण तो हर नारी को चूम रहा था
तेरे साथी श्रीदामा और उध्दव जैसे गवाल-बाल थे
आशूमल के सारे साथी, कालेधन के सभी दलाल थे
तूने अपनी सारी लीला,बालक पन में ही खेली थी
आशूमल और नारायण की सभी बूढापे में चेली थी
तेरी चर्चा बृन्दाबन थी, इनकी चर्चा जग जाहिर हेै
तूने केवल रास रची थी, विषय-भोग के ये माहिर है
तेरी महिमा ब्रह्मा,विष्णु शंकर भी खुल कर गाते हैं
आशूमल तो परब्रह्म है,खुद ही सब कुछ बन जाते है
तेरी राधा गाँव की ग्वालन,केवल मुरली ही सुनती है
दो बच्चों की राधे माता, देखो दाँव - पेंच बुनती है
तेरी राधा मथुरा, बृन्दाबन की गलियां घूम रही है
ये बम्बई की राधेमाता जिसको देखो चूम रही है
तेरी राधे माँ की चर्चा पूरी धरती पर जारी है
ये कैसी राधे माता है , दुर्गा माता पर भारी है
एक हाथ में फूल पडा है, एक हाथ त्रिशूल पडा है
वालीवुड की राधे माँ पर, कैसा अफलातून चढा है
भारत में तो सबसे सस्ता भगवानो का भेष हो गया
बाबा, माई, और गृहस्थी, आडम्बर प्रवेष हो गया
व्यभिचार के अय्यासी के धर्म-कर्म कब तक ढोओगे
कवि आग ये प्रारम्भ है ,मौन रहोगे तो राेओगे।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
मो098973998
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