इतिहास का उपहास
अब कृष्ण तुम्हारी गीता में वो द्वापर वाली धार नही
ये मरी कौम है भारत की इसमें जलते अंगार नही
हथियार बहुत है तकनीकी, खुद मरते हैे बस मार नही
अब भारत माँ शर्मिन्दा है, कौमे है, कौमी प्यार नही
गीता तो मात्र उदाहरण है, जिसमे अब वो आभाष नही
ये डेढ अरब के कीडे हैं, शेखर, बिसमिल्लाह, सूभाष नही
इतिहास नपुंसक रोता है, पढकर जिसमें अब जोश नही
शंकर की प्रतिमा खण्डित है,अब प्राण नही आशूतोष नही
अब राम - राम सब रटते है ना धनुष रहा ना बाण रहा
सत्ता में और सियासत में ना चिन्तन है ना प्राण रहा
अवतार धरा में क्यो आये, जब छल कपटी परित्राण रहा
घर-घर मे विभीषण होते है ,ये शदियों से प्रमाण रहा
कोई शिव सैना बजरंगी है, कोई दुर्गा - शक्ति जंगी है
कोई सम्प्रदाय का दंगी है, कोई राजनीति का पंगी है
कोई त्रिशूल त्रिभंगी है, कोई भूखा औेर मतंगी है
रंगरेज यंहा सब रंगी है , व्यभिचारी सारे संगी है
पांच हजार के मुगलो ने दो दशक हमीं पर राज किया
फिर साठ हजार अग्रेंजो ने सौ साल हमारा खून पिया
बस गिनती में दो चार मिले, जो भारत पर कुर्बान हुये
हम साठ करोड की भीडों में मुर्दे शव से शमशान हुये
जो कभी हमारे टुकडे थे ,वो आज हमीं पर हावी है
ये सम्प्रभुता है भारत की, जो भारत पर प्रभावी हेै
कंही पाकिस्तानी पंगा है, नैपाली सिर पर नंगा है
कंही बंग्ला देषी छंगा है, कंही भूटान, चीन का दंगा है
अब अलगाव वाद कश्मीरी है, अमरीका दादा गिरी है
सत्ता है सियासी वोटों की, लावारिस यंहा वजीरी है
क्यों राम, कृष्ण की धरती में अब मुर्दे पैदा होते हैं
कवि आग भी कविता से बस, लाश वतन की ढोते है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग)
मो09897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

No comments:
Post a Comment