Wednesday, August 12, 2015

                        लालकिला
मैं लालकिला हूं  सात दशक से झण्डे ही ढोता आया हूंँ
मुगलों  की और   अंग्रेजो   की   मैे   पुस्तैनी  काया हूंँ
प्राचीर  से  राजनीति   के  चीर  हरण  को  मैं  ढोता हूंँ
संविधान  की  काम-वाशना,  बलात्कार से  मैं रोता हूँ
स्वतन्त्र,के विवश दिवश में अधिनायक   से शर्माया हूंँ
मैं लालकिला हूं सात दशक से  झण्डे ही ढोता आया हूंँ

भगत सिंह,शेखर, सूभाष  को मैंने आँचल पहनाया था
नेहरू,लालबहादुर,  इन्दिरा का परचम  भी लहराया था
वो  अटल बिहरी , सिंह  नाद  से   संसद  में  गुर्राते थे
कंहा  गये  वो  देश  के  नेता, राष्ट्र -  भक्ति  जो गाते थे
कहने को तो  स्वाभिमान  हूंं, नेता  से  लुटता आया हूं
मैं लालकिला हूं सात दशक से झण्डे  ही  ढोता आया हूं

मेरे  उपर   चढकर   नेता  भारत   को   भरमाते  आये
देश से  किसको  क्या लेना  है,सबने  अपने  गाने गाये
धर्म,मजहब और सम्प्रदाय  की   नेताजी  बातें करते है
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,इसाई के झगडो में सारे मरते है
व्यभिचारी और  भ्रष्टाचारी, हर नेता की  मैं  परछाया हूं
मैं लालकिला हूं सात दशक से झण्डे  ही  ढोता आया हूं

छोटे - छोटे  राजनीति   के   डबरे   मुझको  देख  रहे हैं
गठबन्धन  की  आशाओं  से, अपनी   नजरें सेंक रहे हैं
कौम,कबीले, जाति-पांति  के   गठजोडो  से  भरमाते है
देखो   कालनिमी   भारत   के  राष्ट्र-गीत   कैसे  गाते हेैं
जिस  पर  किया भरोसा मैंने,उससे  ही  मैं पछताया हूं
मैं लालकिला हूं सात दशक से झण्डे  ही  ढोता आया हूं

अब मोदी पर किया  भरोशा ,स्वाभिमान  को  पाने का
कुछ  वंहा  भी  मौका  ढूंढ  रहे हैं,राजनीति  गर्माने का
मुझ पर चढ कर भाषण देना  नेता की   गौरव गाथा हेै
रातजनीति में नेताओं को मुझपर  चढना क्यों भाता है
मैं आलीशान भवन दुनिया  का था,अब  जर्जर काया हूं
मैं लालकिला हूं सात दशक  से  झण्डे ही ढोता आया हूं

अब प्रजातन्त्र का मन्दिर संसद  बीहड  बनता जाता हूं
इस  मन्दिर  में , मैं  तो  केवल  नेताओं से शर्माता हूं
अपशब्दों  से  एक   दूसरे   के   ही   कपडे  फाड  रहे है
सडक  छाप  चेले  हर  दल के,  नेता जी  को ताड रहे है
इस मन्दिर में  टुच्ची  बातें  सुनकर  ही  मैं  मुर्झाया हूं
मैं लालकिला हूं सात दशक से झण्डे  ही  ढोता आया हूं

संविधान  की कसमे, रस्मे खाकर मुझ पर चढने वालों
भारत मां को लूट-लूट  कर, खाने   वालों  सभी दलालों
आशा,भांषा,भाव,भंगिमा  से  मुझको  क्यों तोड रहे हो
राजनीति  से  टुकडे - टुकडे  करके  भारत  जोड  रहे हो
आजादी  के  बाद  आग   के  छन्दो    से  मैं  गर्माया हूं
मैं लालकिला हूं सात दशक से  झण्डे  ही  ढोता आया हूं।।
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                      9897399815
          rajendrakikalam.blogspot.com

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