रज में ध्वज
अब राष्ट्र गीत के मीत देश मे कंहा बचे हैं
जो मरे राष्ट्र के खातिर हमको कंहा पचे हैं
आदर्श वही हेै, जिसने भी षडयन्त्र रचे हेैं
हम कविता लिखते है बोलो किसे जंचे हेैं
सूभाष, भगत, शेखर को मैने हरदम गाया
लिखते-लिखते थका किसी को रास ना आया
व्यापम्, पापम्,ललित मोदी में आकर्षण है
ये राजनीति के व्यभिचार का ही घर्षण हेै
हर टी0 वी0 चैनल, समाचार का यही हाल हेै
बस ,ढूँढ रहे हैं राजनीति में कंहा दलाल हेै
टुच्ची खबरों से हमको रस मिल जाता हेै
क्या यही राष्ट्र की दुनियां में गौरव गाथा है
नेता,नेता के उपर ही कीचड फेंक रहा है
जनमानस मजबूर दृष्टि को सेंक रहा है
जो जितना बडा लफंगा, वो उतना भारी हेै
सबकी नजर में सत्ता है बस जंग जारी है
हर बडी - बडी रैली में नेता भौंक रहे है
अपनी - अपनी दाल सियासी छौंक रहे हेैं
चैनल पर तर्को को सुनकर शर्माता हूँ
मजबूरी में जला - भुना कविता गाता हूँ
स्वतन्त्र दिवस भी अब जल्दी आने वाला हेै
दुर्भागय तिरंगा झेल रहा गडबड झाला हेै
राष्ट्र - गीत विपरीत मीत सब देख रहा है
मजबूरी में मौन अश्रु - जल फेंक रहा है
कभी किसी ने राष्ट्र ध्वजों के दुख को जाना
उन झडते पुष्पों के कष्टों को पहचाना
हर पुष्प गिरा, पद चापों से कुचला जाता हेै
देश का नेता राष्ट्र - गीत फिर भी गाता है
अब तो छोटे बच्चे ही झण्डा ढोते हैं
नौकर शाही , नेता बस, इज्जत खोते हैं
ये पर्व मनाना, मजबूरी क्यों बन जाती है
ये राजनीति ही भारत माता को खाती है
नोटिस और निमन्त्रण से भीडें आती हेैं
इस राष्ट्र -पर्व की भारत में कैसी ख्याति है
उन वीरों का कब तक तुम अपमान करोगे
कवि आग तुम किस-किस का गुणगान करोगे ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
मो098973998
rajendrakikalam.blogspot.com
अब राष्ट्र गीत के मीत देश मे कंहा बचे हैं
जो मरे राष्ट्र के खातिर हमको कंहा पचे हैं
आदर्श वही हेै, जिसने भी षडयन्त्र रचे हेैं
हम कविता लिखते है बोलो किसे जंचे हेैं
सूभाष, भगत, शेखर को मैने हरदम गाया
लिखते-लिखते थका किसी को रास ना आया
व्यापम्, पापम्,ललित मोदी में आकर्षण है
ये राजनीति के व्यभिचार का ही घर्षण हेै
हर टी0 वी0 चैनल, समाचार का यही हाल हेै
बस ,ढूँढ रहे हैं राजनीति में कंहा दलाल हेै
टुच्ची खबरों से हमको रस मिल जाता हेै
क्या यही राष्ट्र की दुनियां में गौरव गाथा है
नेता,नेता के उपर ही कीचड फेंक रहा है
जनमानस मजबूर दृष्टि को सेंक रहा है
जो जितना बडा लफंगा, वो उतना भारी हेै
सबकी नजर में सत्ता है बस जंग जारी है
हर बडी - बडी रैली में नेता भौंक रहे है
अपनी - अपनी दाल सियासी छौंक रहे हेैं
चैनल पर तर्को को सुनकर शर्माता हूँ
मजबूरी में जला - भुना कविता गाता हूँ
स्वतन्त्र दिवस भी अब जल्दी आने वाला हेै
दुर्भागय तिरंगा झेल रहा गडबड झाला हेै
राष्ट्र - गीत विपरीत मीत सब देख रहा है
मजबूरी में मौन अश्रु - जल फेंक रहा है
कभी किसी ने राष्ट्र ध्वजों के दुख को जाना
उन झडते पुष्पों के कष्टों को पहचाना
हर पुष्प गिरा, पद चापों से कुचला जाता हेै
देश का नेता राष्ट्र - गीत फिर भी गाता है
अब तो छोटे बच्चे ही झण्डा ढोते हैं
नौकर शाही , नेता बस, इज्जत खोते हैं
ये पर्व मनाना, मजबूरी क्यों बन जाती है
ये राजनीति ही भारत माता को खाती है
नोटिस और निमन्त्रण से भीडें आती हेैं
इस राष्ट्र -पर्व की भारत में कैसी ख्याति है
उन वीरों का कब तक तुम अपमान करोगे
कवि आग तुम किस-किस का गुणगान करोगे ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
मो098973998
rajendrakikalam.blogspot.com

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