Monday, February 1, 2016

चर्म का धर्म
धर्म-ग्रन्थ को पडते-पडते मानवता के बीज सड गये
नई पीढी में मजहब,कौम,कबीलों के भी कीडे पड गये
धर्मगुरू भी इन कीडों को भी अपने ढंग से पाल रहे हैं
सम्प्रदाय की राजनीति में कीडो को खंगाल रहे हैं

इन भीडों में राम, कृष्ण, महावीर ,बुद्व चुपचाप खडे हैं
ईशा, मूसा, पीर मुहम्मद के भी अपने अलग घडे हैं
इन सब की वाणी को अब तक तोते ही तो बांच रहे हैं
रंग - मंच पर सारे तोते अपने ढंग से नाच रहे हैं

मेरे देश मे राम, कृष्ण भी कोर्ट-कचहरी झेल रहे हैं
राजनीति मे दोनो के अनुयायी खुश है ,खेल रहे हैं
मन्दिर,मस्जिद के झगडे में धर्म-धाम नीलाम हो गये
मुल्ला के अल्लाह गायब हैं और हमारे राम खो गये

जिनका कोई जन्म नही है,जन्म उन्ही का ढूंढ रहे हैं
अर्जी - फर्जी तारीखों से, अनुयायी को मूंड रहे हैं
अवतारों का इस धरती में आना ही अभिशाप हो गया
जप,तप,पूजा,पाठ नमाजी आज देश में पाप हो गया

आने वाली नई पीढी भी इन धर्मो से भटक रही है
वेद,शास्त्र,रामायण ,गीता,गले भक्त के लटक रही है
सत्य,अहिंसा,प्रेम की भांषा,नये-नये शोले छोड रही हैं
अपनी - अपनी परिभांषाये, परम्पराये जोड रही हैं

नये - नये धर्मो को तोते अपने ढंग से पनपाते हैं
धर्मो के इस रण-क्षेत्र में सब अपनी गीता गाते हैं
मानव के विपरीत धर्म को जग से आज मिटाना होगा
कवि आग कहता है हमको मजहब नया बनाना होगा
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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