गुमनाम हवेली
मेरे देश के बच्चे सब बर्बाद हो गये , राजनीति के मुर्दे सढ कर खाद हो गये
शिक्षा की सरिता में गढ कर राख हो गये ,गुरूकुल और मदरसे अब जेहाद होगये
हर चैनल पर अहिसुष्णता ही छायी है, उचे शिखरों के नीचे गहरी खाई है
ऱाजनीति के शव सत्ता में हरजायी है ये गंगा,यमुना तहजीबो की भी काई हैं
पी.एम,सी.एम.,डी.एम.गुर्के झाँक रहे है, प्रजातन्त्र की औकातों को आँक रहे हैं
बुद्विजीवी कबर में जिन्दे मौन खडे हैं,ये वाणी भूषण हर चैनल में कौने,धढे हैं
झण्डे ,डण्डे, हथकण्डे ही झूम रहे है, नेता सब निश्चिन्त हुये हैं घूम रहे हैं
अपने - अपने बोट - बैंक को सहलाते है, अपना-अपना राष्ट्र-गीत ही सब गाते हैं
काशमीर की मटकी सारे फोड रहे हैं,हिन्दू-हिन्दू, मुस्लिम - मुस्लिम जोड रहे है
सारे नेता मिलकर कद्दू काट रहे है, जयचन्द सियासी अपने हिस्से बाँट रहे है
हर कोने में आतंकी जेहाद मचा है, इन झगडो में बस, नेता उस्ताद बचा है
छुट भैय्या और चेले ही बस भौंक रहे हैं,घण्टाल गुरू ही,दाल सियासी छौंक रहे हैं
आज नपुंशक सत्ता गुम-शुम डोल रही है,गुमनाम हवेली जहर सियासी घोल रही है
भटके मुल्ले भी अपनी हद तोड रहे हैं,ये कूरूआन को अपने ढंग से मोड रहे हैं
मेरे घर का नाटक दुनिया देख रही है,निर्पेक्ष्-धर्म के उपर कीचड फेंक रही है
हम विश्वगुरू के सपने क्या साकार करेंगे,इस वैमनस्यता से केवल संस्कार मरेंगे
हे भारत माँ तेरा सिंहासन डोल् रहा है,मौनी बाबा मौन हुआ सब बोल रहा है
अधिवक्ता,अधिवक्ता को ही काट रहे हैं,कानून यंहा पर कानूनों को चाट रहे हैं
बैरिस्टर सब राजनीति के मीत हो गये,सम्प्रभुता सम्पन्न सियासी गीत हो गये
संविधान के शोले सारे शीत हो गये,इस प्रजातन्त्र में हम जैसे, भयभीत हो गये
चुप्पी तोडो मोदी अब तो अस्त्र उठाओ, राजनीति को छोड राष्ट्रनीति अपनाओ
सरिता छोडो,सागर की लहरों को देखो,अहिसुष्ण हुयी है धरती अपनी दृष्टि फेंको
सभी दलों को मिलकर आगे आना होगा,राष्ट्र-भक्त, आसक्त वक्त अपनाना होगा
अग्निशिखा से लपट सियासी फैंक रहा हूँ,मैं कवि आग हूँ,अंगारे ही देख रहा हूँ ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815

No comments:
Post a Comment