Friday, February 26, 2016

नारी  का  ये कौमार्य   बदन
बनता श्रृष्टि  सोंन्दर्य   पतन
कहीं योगी रुप  है  शंकर का
कहीं अंग-अंग रमता है मदन
               51
योग- भोग   समरुप   सरस
श्रृष्टि  ने  ऐसी   रची    बाला
ये विशय  वृष्टि  नारायण की
वधु  से बनती   है   वधुशला
               52
कुछ वधु विरोधी  मजहब  हैं
नारी  निकृष्ट    बना     डाली
हर  शब्द  पुरुष  प्रधान  बना
कैसी  नारी  की   छवि  काली
               53
नारी  है नशल - फसल रचना
जो  पुरुष  वृक्ष की    हैे   डाली
वधु  ने गुल चमन बना  डाला
सिंचन करता  है   नर   माली
          54
कहते   हैं  नारी   बे ग म   है
जो  गम का जीवन जीती  है
सहती  है  अत्याचार  विकट
निज  घूंट लहु  का  पीती   है
               55
क्या धर्म इजाजत नही  देता
खुश  हो जीवन  में मधुबाला
आज  मजहब कमजोर  हुआ
हृदय  विदीर्ण  है    वधुशाला
               56
मजहब  में नारी  दफन  हुयी
घूंघट  में  जीवन अस्त  हुआ
विक्षिप्त नरों  की  दुनिया  में
संस्कार श्रृष्टि  से  पस्त  हुआ
               57
जंहा नूर जन्मता  बेगम   से
गम  से  बेगम को भर  डाला
अबला अब सबला  बन  बैठी
कैसी   सिरकस्त    वधुशाला
               58
पश्चिम ने वधु को खोल दिया
हर  वधु  बनी   है   वधुशाला
नर   पर  नारी परभावी     है
श्रृष्टि   में   शंशय   कर डाला
       59
वहां मात्र  भोग  है  वधु बनी
जीवन में मदिरा  का प्याला
विक्षिप्त बना  नर  जीवन  में
नारी   है   मस्त   मधुशाला
               60
स्वालम्बी जीवन पश्चिम का
नारी   स्वयं    बना     डाला
वेद  - शास्त्र  से   वचिंत   थे
नर   कैस  बनता  मतवाला
      61
नारी को जननी   नही माना
नर - नारी में कोइ भेद  नही
रमणी खुद रमण-भ्रमण करती
नर  को  नारी से    खेद     नही
                62
दोनो  गाडी.  के     चाक    बने
स्वछन्द  साथ    में चलते   है
नारी की विकसित  क्षमता  से
सब  राष्ट्र  स्वयं में  पलते    हैं
               63
नारी   का   पूर्ण   मनोरथ   है
नर    अश्व  बना, नारी  रथ  है
तन से मन  से स्वातन्त्र  बने
नारी का  मत  ही सतपथ   है
              64
पश्चिम की   नारी  सबला  है
विकृत अब भोग का भाव बना
जो स्वंय में जीवन जीता    है
उसका जीवन  ना  घाव  बना
               65
मन मस्तिष्क की  नारी    ने
हृदय प्रवेश अब  कर    डाला
ये   समय  चक्र   बतलायेगा
वो  वीर   बेनेगी     वधुषाला
    66
मिस  मैरी  का बुत देख जरा
ईशा  को जिसने जन्म दिया
ये  चमत्कार  है   नारी   का
भटकी हुयी कौम को सनम दिया
                  67
आज जगत  में  नारी   बिना
कोई काम चलता- फलता  है
कौम , कबीला , राष्ट्र    जमी
सब  नारी से  ही चलता   है
 68
कंही भोग में नारी केा देखो
कहीं योग ब्रह्म में लीन बनी
कंहीं रचना श्रृष्टि  की करती
कंहीं राष्ट्रों की गमगीन बनी
                69
एवरेस्ट   पर    नारी     का
कैसा ये विजय पताका   है
अब   संघर्ष   प्रवीण   बनी
कैसी कुदरत की  आका  है
  70
नारी   नभ  में   उडन  भरे
कहीं तैर रही जलधि तल में
कहीे काम देव ज्वाला मुख है
कहीं प्रियतम  है तन शीतल में
               71
कहीं  करती  काम  करो.डो का
हर  अदा में  नर घायल   होता
श्रृंगार  श्रृष्टि   वरदान    मिला
हर  काम  प्रेम  का पल  होता
             72
अहंकार   नर   में        देखो
नारी स्वाभिमान की मूरत है
मां, भगनी, पत्नि  में    देखो
नारी  में रब   की  सूरत    है
               73
निकृष्ट  नरों की  रचना   में
नारी क्यों  नगर-वधू  होती
मजबूरी नाम है अबला  का
श्रृष्टि   मानवता   पर  रेाती
              74
वैष्यालय  हो या   देवालय
सोंन्दर्य श्रृष्टि का   देती   है
कहीं करुणा है कहीं तरुणा  है
भावों  में सबको भिगोती  है
  75
नर के कारण वधु,वधिक बनी
संहार श्रृष्टि    का   कर   डाला
विस्मय में आज समाज बना
वधु बनी  भंयकर   वधुशाला

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