इस एक पक्षीय भाव ने मेरे अन्तर हृदय को झकझोर दिया और नारी हृदय का भवनात्मक सुकोमल रुप उघड कर सामने आया ! साथ ही एक महत्व पूर्ण वैदिक मंत्र मातृ देवो भव पित्री देवो भव ,गुरु देवो भव मंत्र में मातृ देवो भव सर्व प्रथम में आता है !इन सबके बावजूद भी शास्त्रों में नारी को निकृष्टता से वर्णित किया गया!और स्त्री मात्र भेाग्या बनकर रहगयी ! यदि युग-युगान्तर में कहीं एक श्रुति या श्लोक नारी द्वारा रचा गया होता ओर उसका अन्य की भांति प्रचार-प्रसार होता तो निसन्देह ही नारी की यह दुर्दशा ना होती ! यही कारण है कि नारी मात्र भोग्य वस्तु बनकर रह गयी!
इसके अतिरिक्त शास्त्र प्रमाण हेै कि सती अनुसुइया के पतिधर्म की शक्ति ने ब्रह्मा,विष्णु, शिव को बालक रूप में परिवर्तित कर दिया!सावित्री तो स्वयं यमराज से अपने पति को पुर्नजिवित करा लायी,आधुनिक युग में अहिल्या बाई ,लक्ष्मी बाई,सुल्ताना,जीजाबाई के अतिरिक्त बहुत सी वीरांगनाऐं हैं जो पुरूष वर्ग से भी उत्कृष्ट अवस्था में हैं,चाहे वह सांसारिक जीवन हो या आध्यात्मिक जीवन हो! कुल मिलाकर मेरे कहने का अभिप्राय यह है कि स्त्री में किसी भी क्षेत्र में पुरूष से कम क्षमता,प्रतिभा व सम्भावना नहीं है!
उदाहरणत
अभिशिप्त हुयी गौतम पत्नि
अबला को शापित कर डाला
घटना सतयुग में घटित हुयी
सोचो कैसी थी वधु बाला
त्रेता सीता द्वापर द्रोपति
परमेश्वर पुरुष बना डाला
सीता बन में द्रोपदी जन में
देखो अपमानित वधुबाला
उत्थान पतन का अवलम्बन
वधु ममता का कैसा बन्धन
यह दिव्य शक्ति का आरोहण
संस्कार श्रृष्टि का अन्वेषण
जल थल स्थल की वशुन्धरा
तपता यौवन ज्यों स्वर्ण खरा
अमुल्य रत्न जग जननी है
हर घाव हृदय का करे हरा
ब्रह्माण्ड अखिल अखिलेश्रर की
वधु शक्ति , भक्ति ,आशक्ति है
ये रिम झिम वर्षा सावन की
वधु अनाशक्त अभि व्य क्ति है
यह आग युगों की ज्वाला है
विकराल कराल कराला है
वधु रंग जमाती हाला है
वधु आग रचित वधुशाला है
महान साहित्य कारो द्वारा महान कवियों की रचना में नारी मात्र श्रृंगार का माध्यम रही!चाहे वह संयोग श्रृंगार हो या वियोग श्रृंगार,केन्द्र में नारी ही है!और आधुनिक युग में तो कई तथाकथित कवि वर्ग भी है, जो मात्र नारी को हास्य ओर व्ंयगात्मक शैली से निम्न स्तर तक पहुचाने का कार्य निरन्तर करते रहते हैं ! कोई भी साहित्यकार कहीं या कभी नारी से कुण्ठित या लज्जित हुआ हो तो उसने अपने कुण्ठित हृदय की पीडा का प्रक्षेपण अपने साहित्य में अवश्य वर्णित किया !
प्रायः यह देखने में आया !इसका उदाहरण महा कवि कालिदास, तुलसी दास ,व भर्तृहरि इत्यादि हेैं ! जिनके संयोग व वियोग में नारी ही केद्रित है!और आशेचर्य तो तब होता है कि कालिदास की प्रेरणादायिनी स्वयं विद्योत्तमा ,तुलसी दास की प्रेरणादायिनी रत्ना तथा सूरदास की प्रेरणादायी उनकी प्रेयसी कन्तो रही हो, इन सबके बावजूद भी इस आध्यात्मिक देश में दुर्गा,काली,उमा,पार्वती,लक्ष्मी, सरस्वति, सीता,राधा,अनुसुइया आदि कितनी नारियाॅं हें जो हमारे देवताओं ,भगवानों की प्रेरणा स्रोत रही हैं! ऐसा शास्त्र कहता है!
कवि भर्तृहरि की कुण्ठा ने
कितना नारी तृष्कार किया
कालीदास ने नारी का
इस श्रृष्टि में सत्कार किया
नारी शक्ति के भावो से उद्वेलित हो कर,ममत्व, वात्सल्य पूर्ण समाज से प्रेरणा पाकर वधुशाला शतक लिखने की हिम्मत जुटा पाया हूं! अपने पाठकों से यह आकांक्षा रखता हूं कि इस अबोध बुद्वि से परिलक्षित हुई इस वधुशाला के शब्दों के अन्तराल में जो विकृत समाज की भाव भंगिमा है उसकी जटिलता से उपर उठकर नारी वेदना को ध्यान से परिलक्षित करें तोयह स्पष्ट हो जायेगा कि समाज में नारी का क्या मुल्यांकन होना चाहिये था!और यदि यही रुढी.वादी परंपरा समाज में चलती रही तो आने वाले समाज एक विकृत रुप ले लेगा इसमें संदेह नही है! नारी के वास्तिविक सौन्दर्य एवं गौरव को बचाना ही वधुशाला का एक मात्र उद्वेश्य ह
वधुशाला - शतक
1
कौशिश है अंग-तरगं बने
आनन्दित अंग बना डाला
सामंजस भृंग तरंगो का
रचता नवरंग व धू शा ला
2
जुल्फें चन्दन बन व्याल बनी
खुशबू है दंश कराल बनी
हर शाख में लिपटी माला सी
घन-घेार घटा घनशाल बनी
3
मस्तक में गगन समाया है
क्या सोम व्योम का नाता है
त्रिनेत्र भेद की गुप्त गुहा
लट से ललाट बल खाता है
4
सर सन्धान सी भृकुटि बनी
कैसी हरि हर की दृष्टि है
नटखट हर हरकत हाट बनी
ज्यों इन्द्र धनुष पर वृष्टि है
5
नयना है तीव्र कटारों से
निर्जन बन सरल सरोवर सी
स्नान ध्यान ऋषि देवों का
श्रृष्टि सोन्दर्य मनोहर सी
6
भृकुटि भयंकर बन जाये
जब बात हृदय को ना भाये
कहीं विधु वधु शोला बनती है
कहीं प्रेम नयन में हरषाये
7
पलके नयना पलकाती है
दृष्टि से द्वार हटाती है
कब बन्द करे कब खुलजाये
हरी, हर से हाट हटाती है
8
पलकों पर बाल झरोंखें से
उनका अपना ही धोखा है
कुंजों से यौवन झांक रहा
कुदरत का खेल अनोखा है
9
कन्दराह है कर्ण हिमालय से
जहां गमन शब्द का होता है
सूक्ष्म शब्द योगी बनकर
प्रियतम के हिय में खेाता है
10
कैसे कपोल हैं रवि शशि से
स्वछन्द व्यवस्थित मधुर रमण
सन्ध्या सोन्दर्य घटित होता
ज्यों नभ सागर में छवि दर्पण
11
अधरों की लाली मतवाली
हिलमिल सोंदर्य बखान करे
सरस श्रृष्टि अधरा धर की
मासूम अधर रसपान करे
12
संचार व्यवस्था जिव्ह्या की
ये गुप्त गेह रसराज बनी
कंहीं चूम रही कंही झूम रही
संगीत सूरों की राग बनी
13
वधु कंठ सुधा संवर्धन है
ये सरिता सरस बहाती है
संयोग वियोग श्रृंगार मधुर
वधुशाला कण्ठ से गाती है
14
बुद्वि हृदय मध्यस्त बनी
संयोग योग बनवाती है
अवलम्बन है दो द्वीपों का
चिन्तन मन्थन करवाती है
15
स्तन हैं शिखर हिमालय से
हिममण्डित से आच्छादित हैं
रवि लौ से थोडा सा पिघले
गम्भी दृष्टि संम्पादित है
16
गोलाकृति है महाद्विपों की
आकर्षित श्रृष्टि भ्रमण करती
हर छैल छबीला वधु यौवन
आसक्त वक्ष अर्पण करती
17
स्तन है परिचय मां शशू का
पय पान वधू से होता है
नर का आकर्षण वक्ष बने
अतरंग खोज में खोता है
18
वधु का परिचय स्तन ही है
ये उम्र का भेद बताता है
मर्मस्थल प्रियतम गुप्त रमण
हर वधु की यौवन गाथा है
19
नाभी है भंवर बहाओं का
जहां नर पतंग ही फंसता है
संचार केन्द्र उर्जा का है
इन्द्री केा रसों से कसता है
20
ये काम देव ज्वाला मुख है
लावा की लहरे गुप्त लपट
विशय वाशना की लौ से
ये शीतल तन अंगार विकट
21
भग,जनम द्वार है जीवों का
जहां बीज अंकुरित होता है
सहवाशं से बदनाम हुआ
हर जीव प्रतिष्ठा खोता है
22
ये प्रथम सदन है रचना का
जहां रज,हज पुण्य कमाता है
नौ मास समाधि सुरति चढी
नवजात शिशू घर आता है
23
हर जीव की गेह गुफा घर है
योगी,वधु कोक में भ्रमण करे
फिर काम वाशना पुरुषो की
वधुशाला,वधु मिल रमण करे
इसके अतिरिक्त शास्त्र प्रमाण हेै कि सती अनुसुइया के पतिधर्म की शक्ति ने ब्रह्मा,विष्णु, शिव को बालक रूप में परिवर्तित कर दिया!सावित्री तो स्वयं यमराज से अपने पति को पुर्नजिवित करा लायी,आधुनिक युग में अहिल्या बाई ,लक्ष्मी बाई,सुल्ताना,जीजाबाई के अतिरिक्त बहुत सी वीरांगनाऐं हैं जो पुरूष वर्ग से भी उत्कृष्ट अवस्था में हैं,चाहे वह सांसारिक जीवन हो या आध्यात्मिक जीवन हो! कुल मिलाकर मेरे कहने का अभिप्राय यह है कि स्त्री में किसी भी क्षेत्र में पुरूष से कम क्षमता,प्रतिभा व सम्भावना नहीं है!
उदाहरणत
अभिशिप्त हुयी गौतम पत्नि
अबला को शापित कर डाला
घटना सतयुग में घटित हुयी
सोचो कैसी थी वधु बाला
त्रेता सीता द्वापर द्रोपति
परमेश्वर पुरुष बना डाला
सीता बन में द्रोपदी जन में
देखो अपमानित वधुबाला
उत्थान पतन का अवलम्बन
वधु ममता का कैसा बन्धन
यह दिव्य शक्ति का आरोहण
संस्कार श्रृष्टि का अन्वेषण
जल थल स्थल की वशुन्धरा
तपता यौवन ज्यों स्वर्ण खरा
अमुल्य रत्न जग जननी है
हर घाव हृदय का करे हरा
ब्रह्माण्ड अखिल अखिलेश्रर की
वधु शक्ति , भक्ति ,आशक्ति है
ये रिम झिम वर्षा सावन की
वधु अनाशक्त अभि व्य क्ति है
यह आग युगों की ज्वाला है
विकराल कराल कराला है
वधु रंग जमाती हाला है
वधु आग रचित वधुशाला है
महान साहित्य कारो द्वारा महान कवियों की रचना में नारी मात्र श्रृंगार का माध्यम रही!चाहे वह संयोग श्रृंगार हो या वियोग श्रृंगार,केन्द्र में नारी ही है!और आधुनिक युग में तो कई तथाकथित कवि वर्ग भी है, जो मात्र नारी को हास्य ओर व्ंयगात्मक शैली से निम्न स्तर तक पहुचाने का कार्य निरन्तर करते रहते हैं ! कोई भी साहित्यकार कहीं या कभी नारी से कुण्ठित या लज्जित हुआ हो तो उसने अपने कुण्ठित हृदय की पीडा का प्रक्षेपण अपने साहित्य में अवश्य वर्णित किया !
प्रायः यह देखने में आया !इसका उदाहरण महा कवि कालिदास, तुलसी दास ,व भर्तृहरि इत्यादि हेैं ! जिनके संयोग व वियोग में नारी ही केद्रित है!और आशेचर्य तो तब होता है कि कालिदास की प्रेरणादायिनी स्वयं विद्योत्तमा ,तुलसी दास की प्रेरणादायिनी रत्ना तथा सूरदास की प्रेरणादायी उनकी प्रेयसी कन्तो रही हो, इन सबके बावजूद भी इस आध्यात्मिक देश में दुर्गा,काली,उमा,पार्वती,लक्ष्मी, सरस्वति, सीता,राधा,अनुसुइया आदि कितनी नारियाॅं हें जो हमारे देवताओं ,भगवानों की प्रेरणा स्रोत रही हैं! ऐसा शास्त्र कहता है!
कवि भर्तृहरि की कुण्ठा ने
कितना नारी तृष्कार किया
कालीदास ने नारी का
इस श्रृष्टि में सत्कार किया
नारी शक्ति के भावो से उद्वेलित हो कर,ममत्व, वात्सल्य पूर्ण समाज से प्रेरणा पाकर वधुशाला शतक लिखने की हिम्मत जुटा पाया हूं! अपने पाठकों से यह आकांक्षा रखता हूं कि इस अबोध बुद्वि से परिलक्षित हुई इस वधुशाला के शब्दों के अन्तराल में जो विकृत समाज की भाव भंगिमा है उसकी जटिलता से उपर उठकर नारी वेदना को ध्यान से परिलक्षित करें तोयह स्पष्ट हो जायेगा कि समाज में नारी का क्या मुल्यांकन होना चाहिये था!और यदि यही रुढी.वादी परंपरा समाज में चलती रही तो आने वाले समाज एक विकृत रुप ले लेगा इसमें संदेह नही है! नारी के वास्तिविक सौन्दर्य एवं गौरव को बचाना ही वधुशाला का एक मात्र उद्वेश्य ह
वधुशाला - शतक
1
कौशिश है अंग-तरगं बने
आनन्दित अंग बना डाला
सामंजस भृंग तरंगो का
रचता नवरंग व धू शा ला
2
जुल्फें चन्दन बन व्याल बनी
खुशबू है दंश कराल बनी
हर शाख में लिपटी माला सी
घन-घेार घटा घनशाल बनी
3
मस्तक में गगन समाया है
क्या सोम व्योम का नाता है
त्रिनेत्र भेद की गुप्त गुहा
लट से ललाट बल खाता है
4
सर सन्धान सी भृकुटि बनी
कैसी हरि हर की दृष्टि है
नटखट हर हरकत हाट बनी
ज्यों इन्द्र धनुष पर वृष्टि है
5
नयना है तीव्र कटारों से
निर्जन बन सरल सरोवर सी
स्नान ध्यान ऋषि देवों का
श्रृष्टि सोन्दर्य मनोहर सी
6
भृकुटि भयंकर बन जाये
जब बात हृदय को ना भाये
कहीं विधु वधु शोला बनती है
कहीं प्रेम नयन में हरषाये
7
पलके नयना पलकाती है
दृष्टि से द्वार हटाती है
कब बन्द करे कब खुलजाये
हरी, हर से हाट हटाती है
8
पलकों पर बाल झरोंखें से
उनका अपना ही धोखा है
कुंजों से यौवन झांक रहा
कुदरत का खेल अनोखा है
9
कन्दराह है कर्ण हिमालय से
जहां गमन शब्द का होता है
सूक्ष्म शब्द योगी बनकर
प्रियतम के हिय में खेाता है
10
कैसे कपोल हैं रवि शशि से
स्वछन्द व्यवस्थित मधुर रमण
सन्ध्या सोन्दर्य घटित होता
ज्यों नभ सागर में छवि दर्पण
11
अधरों की लाली मतवाली
हिलमिल सोंदर्य बखान करे
सरस श्रृष्टि अधरा धर की
मासूम अधर रसपान करे
12
संचार व्यवस्था जिव्ह्या की
ये गुप्त गेह रसराज बनी
कंहीं चूम रही कंही झूम रही
संगीत सूरों की राग बनी
13
वधु कंठ सुधा संवर्धन है
ये सरिता सरस बहाती है
संयोग वियोग श्रृंगार मधुर
वधुशाला कण्ठ से गाती है
14
बुद्वि हृदय मध्यस्त बनी
संयोग योग बनवाती है
अवलम्बन है दो द्वीपों का
चिन्तन मन्थन करवाती है
15
स्तन हैं शिखर हिमालय से
हिममण्डित से आच्छादित हैं
रवि लौ से थोडा सा पिघले
गम्भी दृष्टि संम्पादित है
16
गोलाकृति है महाद्विपों की
आकर्षित श्रृष्टि भ्रमण करती
हर छैल छबीला वधु यौवन
आसक्त वक्ष अर्पण करती
17
स्तन है परिचय मां शशू का
पय पान वधू से होता है
नर का आकर्षण वक्ष बने
अतरंग खोज में खोता है
18
वधु का परिचय स्तन ही है
ये उम्र का भेद बताता है
मर्मस्थल प्रियतम गुप्त रमण
हर वधु की यौवन गाथा है
19
नाभी है भंवर बहाओं का
जहां नर पतंग ही फंसता है
संचार केन्द्र उर्जा का है
इन्द्री केा रसों से कसता है
20
ये काम देव ज्वाला मुख है
लावा की लहरे गुप्त लपट
विशय वाशना की लौ से
ये शीतल तन अंगार विकट
21
भग,जनम द्वार है जीवों का
जहां बीज अंकुरित होता है
सहवाशं से बदनाम हुआ
हर जीव प्रतिष्ठा खोता है
22
ये प्रथम सदन है रचना का
जहां रज,हज पुण्य कमाता है
नौ मास समाधि सुरति चढी
नवजात शिशू घर आता है
23
हर जीव की गेह गुफा घर है
योगी,वधु कोक में भ्रमण करे
फिर काम वाशना पुरुषो की
वधुशाला,वधु मिल रमण करे
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