मजहबी तूफान
तोड कर बेगम, गमों को दम से आगे बढ रही है
हर मजहब की रूढिया बे-दम पढी हैं सढ रही है
कारागृह की बेडिया भी अब रूग्ण हो कर टूटती हैं
तालीम की दर-दर दरख्तो में कलि नई फूटती है
अब धर्म, मजहब, सम्प्रदायों को बदलना चाहिये
हर समय और काल का पदचाप चलना चाहिये
नास्तिकों की भीड ये परिणाम खुद ही बोलती है
नयी पीढियां औकात धर्मो की बराबर खोलती है
वो समय कुछ और था लिख दिया,अब वो नही है
आज जो कुछ हो रहा है, वो लिखो तो कुछ सही है
खण्डहरो की वो व्यवस्था अब ना चलने पायेगी
तुम हटो, पथ छोड दो, नई नश्ल आगे आयेगी
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,इसाई में बगावत चल रही है
नश्ल मुर्दा हो गयी है,अब भी शवो से पल रही है
मजहबों के धर्म गुरू क्यों लाश पर भी मौन हैं
अहिसुष्णता के मजहबों का जुर्म, मुजर्रिम कोैन हेै
धर्म का वो पथ पथिक हमको नजर आता नही हेै
क्यों मजहबी तालीम का मन्जर हमें भाता नही हेै
जर-जर इमारत धर्म,मजहब की बदलनी चाहिये
प्यार की गंगा मजहब के तट पे चलनी चाहिये
अपनी अकड से धर्म,मजहब लुप्त होता जायेगा
गीता,कूरान और बाइबिल को कौन है जो गायेगा
भयमुक्त करदे जो धर्म, धरती में आना चाहिये
कवि आग को तो प्रेम का मजहब तराना चाहिये।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815

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