Saturday, February 6, 2016

अगर आप प्रयास करें तो इस प्रार्थना को पाठ्यक्रम में लगाया जा सकता है

ईश्वर का ऐश्वर्य
मैंने ईश्वर को देखा है, वो सागर से डोल रहा हेै
नतमस्तक होकर सागर भी ईश्वर के संग डोल रहा है
फिर सूरज की ओर इशारा, सागर में गर्मी फैलाओ
परंपिता जल से कहता है,तुम अपना अस्तित्व मिटाओ

स्वयं अम्बू अस्तित्व मिटाता,भाप बनाकर उड जाता है
पाकर फिर आदेश पवन भी ,मेघ शून्य में ले जाता हेै
वृक्ष,जीव ओैर गिरि की पूजा को भी ईश्वर देख रहा है
सूखे कण्ठ, उदर सृष्टि पर वृष्टि ,दृष्टि से फेंक रहा है

पवन,जीर्ण पत्तियों के शव,द्रुम से अलग-अलग करती है
वही पत्तियां सड कर गल कर खाद बनी अपनी धरती हेै
नयी-नयी कोमल कलियां भी तो वृक्षो पर इठलाती हैं
भरे बसन्त में सृष्टि संरचना उस ईश्वर के गुण गाती है

हर किसान को मौन शब्द से परमेश्वर समझाता आया
हल के फल से वशुन्धरा के शुष्क हृदय को यूं सहलाया
धरती मां आसक्त हुयी सी उदर चीर कर सब देती है
परं कृषक परमेश्वर ही है, हम सब तो उसकी खेती हेैं

फिर भी हम सब मानव होकर,परंपिता को भूल रहे हेैं
काम,क्रोध,मद,लोभ,मोह के पञ्चतत्व में झूल रहे हैं
उस ईश्वर के अहसानो की प्रेम वृष्टि को तो पहचानो
कवि आग,इस वैमनस्य को, छोडो बस,ईश्वर को मानो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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