दुर्भाग्य है इस देष का जो अब भी सो रहा है
अपनेा को भूल बैठा दुसरो! को रो रहा है
स!स्कृति पुरानी अपनी अनजाने खो रहा है
मुर्दा गुलामियत का यह देष ढो रहा है
साहित्य स!स्कृति के विद्वान हो रहे हैं
हर वर्श नवोदय फनकार हो रहे हैं
भारतीयता को मल- मल के धो रहे हैं
प्रारम्भ जनवरी से नव वर्श हो रहे हैं
स्वतंत्रता के बाद नव वर्श आ गया है अनजान थे जो इससे उनको भी भा गया है
रोता है वतन आज अपनी ही भूल से
वि!ध गया मेरा चमन अपने ही षूल से
क्या चैत्र मास का कभी नव वर्श आयेगा
क्या संस्कृति का कोइ निश्कर्श आयेगा
क्या जन की आत्मा से संघर्श आयेगा
क्या देष प्रेम का कभी स्पर्ष आयेगा
मूक होके जीना अब हो गया है धर्म
किस मूंह से कहे!, हिन्द अब आ रही है षर्म
जान कर भी बोला जाता नहीं है मर्म
आग लग रही है और हंस रहा है धर्म
अपनेा को भूल बैठा दुसरो! को रो रहा है
स!स्कृति पुरानी अपनी अनजाने खो रहा है
मुर्दा गुलामियत का यह देष ढो रहा है
साहित्य स!स्कृति के विद्वान हो रहे हैं
हर वर्श नवोदय फनकार हो रहे हैं
भारतीयता को मल- मल के धो रहे हैं
प्रारम्भ जनवरी से नव वर्श हो रहे हैं
स्वतंत्रता के बाद नव वर्श आ गया है अनजान थे जो इससे उनको भी भा गया है
रोता है वतन आज अपनी ही भूल से
वि!ध गया मेरा चमन अपने ही षूल से
क्या चैत्र मास का कभी नव वर्श आयेगा
क्या संस्कृति का कोइ निश्कर्श आयेगा
क्या जन की आत्मा से संघर्श आयेगा
क्या देष प्रेम का कभी स्पर्ष आयेगा
मूक होके जीना अब हो गया है धर्म
किस मूंह से कहे!, हिन्द अब आ रही है षर्म
जान कर भी बोला जाता नहीं है मर्म
आग लग रही है और हंस रहा है धर्म
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