सियासत के फनकार
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै
ये संसद के शंसय नायक भारत की गौरव गााथा है
बडे-बडे फनकार छिपे है खादी कफन लिबाशों में
कफन हटाकर, अरबो-खरबो देखो इनकी लाशों में
स्वीस बैंक के लाकर में भी गिरवी ये भारत माता है
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै
नंगे-भूखे घर से चलकर राष्ट्र-नियन्ता बन जाते हैं
चोर,उचक्के भी भारत के अब अभियन्ता बन जाते हेैं
खूनी,कतली, कालनिमि भी साधू-सन्ता बन जाते हैं
खुजराहो की गुफा देखकर,सभी अजन्ता बन जाते हैं
राजनीति में साधू, नेता, कच्छे - नाडे का नाता है
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै
अरब-खरब की सभी योजना,दिल्ली से पैदल आती हेैं
चौराहों में खादी कुर्तो और दल्लो से टकराती हैं
देश के लेखाकार,सी.ए.सब,गुणा-भाग में लग जाते हैं
सदनों में सभी सियासी, गजट,बजट को दिखलाते हैं
आज मीडिया नेताओं की गौरव-गााथा दिखलाता है
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै
पेट्रोल, डीजल दोनो सस्ते फिर भी मंहगायी जारी है
राजनीति के मन्दिर में साँड भाण्ड ही क्यों भारी है
जरा गरीब से जाकर पूछो, दो - रोटी कैसे खाता हेै
सरकारी स्कूल का बच्चा, केवल राष्ट्र - गीत गाता हेै
राम,बेर भिलनी के खायें, रामभक्त क्या-क्या खाता है
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै
हम तुम जैसे सोच-सोच कर इसी फिक्र में मरजाते हैं
गीदड, कौवे, चील, भेडिये, लाश हमारी ही खाते हैं
नेता,व्यवसायी,बाबा का स्वीस बैक में क्यों खाता है
प्रजातन्त्र में भिखमंगों का,जनमत सबको पनपाता हेै
देश का पैसा,खुद ही चलकर हर नेता के घर आता है
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै
हम,तुम जैसे,जाने कितने ,इसी सोच में मरे हुये है
मठ,मन्दिर और नेताओं के,नोट के बोरे भरे हुये हैं
भुखमरी,गरीबी,मंहगायी,हम तुम मिलकर ही झेलेंगे
ना समझी के इस जनमत से, अब तो भडुवे ही खेलेगे
कवि आग की हर पंक्ति में,चोरों की गौरव गाथा हेै
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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