राजनीति में धर्म
राजनीति में आज विभीषण होने से ही काम चलेगा
अब हनुमान भी नैतिकता के आदर्शों से नही पलेगा
लंकापति और रामलला में अब त्रेता का बैेर नही है
राम राज और रावण युग में सभी एक है, गैर नही है
रावण की नाभी में विष है अब वो अमृतपान नही है
श्रीलंका भी अलग देश है अब वो हिन्दुस्तान नही है
मेघनाथ के शक्तिबाण में अब वो वैसी धार नही है
सुषैन वैद्य की औषधीयों में भ अब वो उपचार नही है
मन्दोदरीयां अब तलाक तो खुद रावण से मांग रही है,
आज सुलोचना मेघनाथ को भी सूली पर टाग रही है
मारीच सूबाहू अब सोने का मृग बनने से कतराते है
नाक कान कटवाने लक्ष्माण, सूपर्णखा के घर जाते है
सीता माता स्वयं राम को कोर्ट कचहरी दिखा रही है
अश्वमेध की पीडा जंगल में लव-कुश को सीखा रही है
आज राम की अग्नि-परीक्षा लेने की औकात नही है
सुख में तो मुमकिन है लेकिन दुख में सीता साथ नही है
रावण भी तो आज लखन को कूटनीति ही सिखलाता हेै
हनूमान और मकरध्वजो का राजनीति से ही नाता है
मकरध्वज तो हनुमान का डी.एन.ए. खुद बन जाता है
ब्रह्मचारी हनुमान कंहा अब पूत्र - मोह से बचपाता है
अब तुलसी भी शव-साधन से सरिता पार नही करता है
कामातुर भी आसक्ति से ,यती - सती पर नही मरता है
कितने तुलसी, वाल्मीकी की रामायण को झांक रहे हेैं
चरित्र सभी का अपने-अपने मुल्यांकन से आंक रहे हैं
राजनीति ने रामचरित की परिभांषा को अपनाया है
अवधेशों का पता नही है,पर रावण खुलकर आया है
इस कलियुग में अवतारों की राजनीति अभिशाप रही है
कवि आग ने हास्य - व्यग में, होने वाली बात कही है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

No comments:
Post a Comment