Tuesday, December 1, 2015

कुदरत की आवाज
वर्षातों में सारी नदियाॅं, बडे़ वेग से बहती हैं
तूफानों के उफानो को वशुन्धरा ही सहती है
उजड़ गया है चमन, प्रकृति मौन सदा से रहती है
परिभांषा में, भूकम्पों की , धरती सब कुछ कहती हैे

सूखी नदियाॅं,बंजर धरती, अभी से मातम मना रही हैं
ये विकाश की परिभांषा विध्वंस पथों को बना रही है
नियम ऋतु के बदल रहें हैं आकालों की अभिलाशा में
मूरख मानवता जीती है, आशा, तृष्णा की भांषा में

जंगल काटो, पानी बाॅंटो, अव्वल दोयम ध रती छाॅंटो
खनिज सम्पदा के पोषण से,धरती के रग रग को चाटो
प्रहरी के प्रहारों से सोन्दर्य धरा का खोता है
मौसम भी तो धरती की मुर्दा लाशों को ढोता है

कंहा गयी वो शर्दी, गर्मी, बर्षातों की फुहर छटा
कंहा गयी वो मेघों के , गर्जाने वाली श्याम घटा
कंहा गयी वो तितली,चिडियाँ,कंहा गयी वो सुमन लटा
वो बसन्त भी कंहा गया, द्रुम की डालों का पीत पटा

क्षत, विक्षत मानवता के शव,मृत शैया पर लेट गये
आकाल,प्रलय प्रलापों से, बे-समय मौत की भेंट गये
इस कुदरत के संवेदन में, ये दीन दशा जब होती है
तब-तब भूत, पिचासों के मानव को धरती ढोती हैे

ये सूनामी,ये हुद-हुद है,कंही प्रलय प्रताप प्रकट खुद है
देख नजारा कुदरत का,ये संकट भी तो अदभुत है
नंगे - भूखे ही मरते हैं, कुदरत की कर्कस आहों से
परिवर्तित होता है मौसम, मानव के मरे गुनाहों से

अस्तित्व बचाना है अपना, संसाधन में घटतोल करो
जंगल और जमीनों में,ना कुदरत से कल्लोल करो
श्रृंगार करो फिर से माॅं का अस्तित्व धरा में लाने को
मैं आग लगाने बैठा हूॅं , चिन्गारी से समझाने को ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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